3 दिसंबर को तय होगा सात सांसदों का राजनीतिक भविष्य – realtimes

भोपाल । मप्र विधानसभा चुनाव को लेकर 17 नवंबर को वोटिंग हो चुकी है। सभी को आगामी 3 दिसंबर का इंतजार है जब ईवीएम में प्रत्याशियों के भाग्य खुलेंगे। इसी दिन मप्र में विधानसभा का चुनाव लडऩे वाले सांसदों का राजनीति भविष्य भी तय होगा। गौरतलब है कि मैजिक की उम्मीद से भाजपा ने मप्र चुनाव में अपने सात सांसदों और एक राष्ट्रीय महासचिव को मैदान में उतारा था। भाजपा का यह निर्णय मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा था। पार्टी को लगता था कि ये बड़े चेहरे न केवल अपनी बल्कि अपने संसदीय क्षेत्र में गुटबाजी और असंतोष को समाप्त कर भाजपा को प्रभावी बढ़त दिलाने में भी सफल रहेंगे। इसके अलावा, विधानसभा चुनाव लड़ाना इन नेताओं की राजनैतिक जमीन और लोकप्रियता परखने का बैरोमीटर भी था। सात सांसदों में तीन केंद्रीय मंत्रियों के अलावा भाजपा केंद्रीय समिति के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ऐसे चेहरे थे, जो मुख्यमंत्री के कद के भी हैं। लेकिन क्या अधिकांश उद्देश्य की पूर्ति करने में सफल हुए हैं?  इस सवाल का जवाब 3 दिसंबर को मिल जाएगा।

विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत सुनिश्चित करने के लिए भाजपा ने अपने तुरूप के इक्को यानी सात सांसदों को विधानसभा चुनाव में उतार दिया। इनमें से अधिकांश सांसद स्टार प्रचारक की भूमिका वाले और चुनावी रणनीतिकार की श्रेणी वाले हैं। पार्टी ने बड़ी उम्मीद के साथ इन्हें चुनावी मैदान में उतारा है। लेकिन इनमें से कई समीकरणों में इस कदर फंस गए हैं कि उनका राजनीतिक भविष्य ही दांव पर आ गया है। जो इस चुनाव में हारेगा उसके राजनीतिक भविष्य पर अंधकार छा जाएगा।

 विधानसभा चुनाव के परिणाम कई मायनों में महत्वपूर्ण होंगे। इससे यह तो तय होगा कि प्रदेश में किस दल की सरकार बनेगी। भाजपा ने रणनीति के तहत विंध्य, महाकोशल और ग्वालियर-चंबल के समीकरणों को देखते हुए सांसदों को चुनाव मैदान में उतारा है। लेकिन कईयों का समीकरण इस कदर गड़बड़ा गया है कि उनकाराजनीतिक भविष्य ही दांव पर लग गया है। उल्लेखलय है कि भाजपा ने जातीय और स्थानीय समीकरणों को साधने के लिए विंध्य अंचल में सांसद रीति पाठक को सीधी और गणेश सिंह को सतना से चुनाव लड़ा गया। पाठक ब्राह्मण और सिंह पिछड़ा वर्ग से आते हैं। दोनों की ही विंध्य की राजनीतिक में महत्वपूर्ण भूमिका है। पिछले चुनाव में विंध्य अंचल में भाजपा का प्रदर्शन सबसे बेहतर रहा था। इस स्थिति को बनाए रखने के लिए पार्टी हर संभव प्रयास किया है। वहीं, महाकोशल क्षेत्र में पार्टी को 2018 के चुनाव में अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। आदिवासी मतदाताओं को साधने के लिए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से लेकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कई कार्यक्रम किए। 33 वर्ष बाद केंद्रीय मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते को निवास, जबलपुर पश्चिम से सांसद राकेश सिंह, नरसिंहपुर से केंद्रीय मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल और गाडरवारा से सांसद उदय प्रताप सिंह को चुनाव मैदान में उतारा। ग्वालियर-चंबल संभाग में भी भाजपा को पिछले चुनाव में नुकसान हुआ था। श्योपुर, मुरैना, भिंड, ग्वालियर, दतिया जिले की 22 में से केवल चार सीटें भाजपा जीत सकी थी। सबलगढ़ और जौरा में तो पार्टी के उम्मीदवार दूसरा स्थान तक नहीं पा सके थे। अंचल के समीकरणों को साधने के लिए भाजपा ने केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को आगे किया और मुरैना जिले के दिमनी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ाया। मालवांचल में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के प्रभाव को देखते हुए उन्हें इंदौर एक सीट से चुनाव मैदान में उतारा गया।

पार्टी पदाधिकारियों का कहना है कि जिस रणनीति के तहत सांसदों को चुनाव मैदान में उतारा गया था, उसका लाभ मिला है। सभी ने पूरे प्रदेश में चुनाव प्रचार किया। कार्यकर्ता एकजुट हुए और पूरी ताकत से चुनाव लड़ा। स्थानीय और जातीय समीकरण साधने में मदद मिली। चुनाव परिणाम में यह परिलक्षित भी होगा। इन सभी नेताओं की अगली भूमिका क्या होगी, यह केंद्रीय नेतृत्व तय करेगा। अभी तो सबका ध्यान मतगणना की तैयारियों पर है। प्रदेश मंत्री रजनीश अग्रवाल का कहना है कि सांसदों को चुनाव लड़ाने का निर्णय केंद्रीय नेतृत्व ने किया था। इनकी आगामी भूमिका क्या होगी, यह भी केंद्रीय नेतृत्व ही परिणाम आने के बाद निर्धारित करेगा। केंद्रीय मंत्रियों समेत सांसदों के विधानसभा क्षेत्रों में मतदान की स्थिति को देखें तो दिमनी और इंदौर एक को छोडक़र सभी सीटों पर मतदान बढ़ा है। दिमनी में मतदान प्रतिशत पिछले चुनाव में 70.34 प्रतिशत था जो घटकर 66.18 प्रतिशत रह गया। इसी तरह इंदौर एक में 69.29 से घटकर 69.08 रहा। जबकि, नरसिंहपुर में 81.71 से बढक़र 82.15, निवास में 79.01 से बढक़र 82.11, सीधी में 68.44 से बढक़र 69.57, सतना में 70.03 से बढक़र 71.92 और गाडरवारा में 83.21 से बढक़र 83.30 प्रतिशत हो गया। इन सात सांसदों के अलावा इसी चुनावी रणनीति के तहत मैदान में उतारे गए भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय भी अपनी इंदौर एक सीट छोडक़र मालवा निमाड़ व प्रदेश की कई सीटों पर दमदारी से चुनावी दौरे करते नजर आए। लेकिन कुल मिलाकर यह बात साफ नजर आ रही है की इन सातों (जहां पिछली बार कांग्रेस ने पांच सीटें जीती थीं) सीटों से भाजपा के वही दिग्गज अपना क्षेत्र छोडक़र अन्य क्षेत्रों में प्रचार के लिये गए, जिन्हें अपनी सीट पर जीत का पूरा भरोसा था। कैलाश विजयवर्गीय प्रहलाद पटेल और कुछ हद तक नरेंद्र सिंह तोमर को छोडक़र अन्य उम्मीदवार अधिकांश समय अपने क्षेत्र पर फोकस करते नजर आए।


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